उद्बोधन
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
प्रार्थना
हे श्रीकृष्ण ! मैं विषयी — कामी हूँ, मैं न तो शरणागति जानता हूँ और न ही ज्ञानी हूँ । मैं सर्वथा निषिद्ध कर्मों में लिप्त रहने वाला नाम मात्र का संन्यासी — संन्यास के नाम पर कलंक हूँ तथा आप सबके सुहृद एवं पतित पावन हो । आप अपनी अहैतुकी कृपा से स्वयं ही मेरा उद्धार करें । मैं आपको प्रणाम करता हूँ ।
हे श्रीकृष्ण ! मेरा जब भी शरीर छूटे उस समय आप की वाणी भगवती गीता का ही स्मरण हो रहा हो । बाहर भीतर सर्वत्र आत्मरूप से आपका ही दर्शन हो रहा हो । इससे भिन्न अन्य कोई भी तृष्णा न हो । आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ ।
भगवती गीता की महिमा
मेरा अनुभव कहता है कि भगवती गीता कोई पुस्तक नहीं बल्कि मनुष्य जीवन का प्रत्यक्ष उत्कर्ष है । मैंने जिस किसी भी ग्रंथ को पढ़ा वहीं गीता की व्याप्ति का अनुभव किया । इसके जैसा प्रत्यक्ष अनुभव कराने वाला, अमृतत्व प्रदान करने वाला अन्य कोई ग्रन्थ है ही नहीं । मनुष्य मात्र को यदि जीवन और समाज के उत्कर्ष की कामना हो तो इस अद्वितीय ग्रन्थ का अनवरत चिन्तन करना चाहिए ।
स्वामी शिवाश्रम
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